रंगोबती के मशहूर गीतकार श्री मित्रभानू गौंटिया पद्मश्री अवार्ड से हुए सम्मानित

रंगोबती के मशहूर गीतकार श्री मित्रभानू गौंटिया पद्मश्री अवार्ड से हुए सम्मानित @ महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के करकमलों से देश के चौथे सर्वोच नागरिक सम्मान पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित होने पर खुशी की लहर
रायगढ़ @ संदेशा 24 रंगोबती के मशहूर गीतकार आदरणीय मित्रभानू गौंटिया को महामहिम राष्ट्रपति आदरणीय श्री रामनाथ कोविंद के करकमलों से देश के चौथे सर्वोच नागरिक सम्मान पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया।

उल्लेखनीय है कि वो गीत जिसने 1980-90 के दशक में धूम मचा दिया था। उस समय ऐसा कोई भी कार्यक्रम नहीं होता था जिसमें यह गीत न बजता हो। उस समय कोई भी बारात ऐसी नहीं होती थी जिसमे इस गीत के धुन में युवा थिरके न हों। वो अति लोकप्रिय गीत था
रंगोबती ओ रंगोबती
रंगोबती रंगोबती कनक लता
इस मशहूर ओड़िया गीत को स्वर दिया था श्री जितेन्द्र हरपाल और सुश्री कृष्णा पटेल जी ने। इस गीत को लिखा था श्री मित्रभानू गौंटिया जी ने और संगीत बद्ध किया था श्री प्रभूदत्त प्रधान जी ने।
इस गीत की गायिका सुश्री कृष्णा पटेल जी और गीतकार श्री मित्रभानू गौटिया जी दोनों अघरिया समाज से हैं।
आकाशवाणी सम्बलपुर द्वारा 1978 में सूरमलिका कार्यक्रम में रेकॉर्डेड इस गीत को 29 जनवरी 1979 में कोलकाता की एक म्यूजिक कंपनी ने रेकॉर्ड के रुप में निकाला। इसके बाद इस गीत ने पूरी दुनिया में धूम मचा दिया। इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह था कि भारत सरकार द्वारा इनको विदेशों में भी कार्यक्रम के लिए भेजा गया । यूरोपीय देशों मे भी रंगोबोती के धुन में , वहाँ के लोग , खूब नाचते रहे है । इस गाने के कारण आप लोगों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली । इस गीत की लोकप्रियता के लिए आपने इसका पूरा श्रेय आम श्रोताओं को दिया जिन्होंने इस गीत को सराहा और इसे चहूं ओर लोकप्रिय बनाया।
आदरणीय मित्रभानू गौटिया जी को इस वर्ष 2020 में कला के क्षेत्र में योगदान के लिए महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है।
मित्रभानू गौटिया जी अघरिया समाज के पहले और एकमात्र पद्मश्री से सम्मानित व्यक्ति हैं।
रंगोबती गाने की लोकप्रियता के कारण ही आपके गांव बिलुंग के लोगों ने 2004 से ही गांव का नाम रंगबती बिलुंग करने की मांग की जा रही थी जिसे राजस्व विभाग ने 2017 में मंजूर किया और 22-07-20 को गांव का नाम बिलुंग से बदलकर “रंगबती बिलुंग” करने का आदेश जारी कर दिया गया है।
ओडिशा के सम्बलपुर जिले के बामड़ा तहसील के गांव बिलुंग में 17 मार्च 1942 में जन्मे श्री मित्रभानू गौंटिया जी ने 15 वर्ष की आयु में ही कक्षा नवमीं में पढ़ते हुए ही साहित्य सृजन प्रारंभ कर दिया था। आपने 1000 से अधिक संबलपुरी गीतों की रचना की है । उस वक्त उनकी रचनाओं में मासा ओडासा काली और पारीख्य चिंता प्रमुख थे। प्रकृति प्रेमी मित्रभानु गौंटिया जी ने अपने गीतों और नाटकों में खत्म होते जंगलों पर चिंता जताते हुए जंगलों को बचाने के साथ ही साथ प्रदूषण, शिक्षा और साक्षरता पर जोर दिया। आपकी रचनाओं में मल्ली, ललिता, मोहिनी, काएरी, द्रौपदी हरण, झार बनिया, हायलू, पखाल खुरी थी महारा, रक्ष्य कबाचा, गांव आमर मां और झी रतन प्रमुख हैं।
मित्रभानू जी को गीत लेखन की प्रेरणा अपने नाना जी जो अपने जमाने के प्रसिद्ध कवि थे और अपने शिक्षक कुमार मणि चौधरी जी से मिली जिन्होंने उन्हें अधिक से अधिक गीत लेखन के लिए प्रोत्साहित किया। एक साक्षात्कार में आपने कहा कि स्थानीय भाषा बोली को उस जमाने में बाहरी लोग नापसंद करते थे लेकिन मां समलेश्वरी की कृपा दृष्टि ने आपको इतने अधिक गीत लेखन संभव किया।
आपको आपके द्वारा कला के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए पूरे देश और दुनिया में सम्मानित किया जा चुका है।
संगीत के लिए ओडिशा संगीत नाटक अकादमी अवार्ड और राष्ट्रीय आकाशवाणी अवार्ड से सम्मानित श्री मित्रभानू गौंटिया जी को सम्बलपुर विश्वविद्यालय द्वारा भी आपकी रचनाओं के लिए सम्मानित किया जा चुका है।



