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रायगढ़

नील हरित शैवाल से सुधरेगी खेतों की सेहत, बढ़ेगा उत्पादन

नील हरित शैवाल से सुधरेगी खेतों की सेहत, बढ़ेगा उत्पादन

*रायगढ़ जिले में 95 गौठानों और 515 किसानों के टांकों में तैयार हो रहा नील हरित शैवाल

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*1800 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में होगा उपयोग, रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

*रायगढ़ जिले में नील हरित खाद बनाने की योजना का क्रियान्वयन शुरू, कलेक्टर द्वारा हो रही लगातार समीक्षा

*कम लागत, अधिक उत्पादन और स्वस्थ मिट्टी की दिशा में रायगढ़ का अभिनव अभियान

*गौठानों से खेतों तक जैविक क्रांति: हजारों क्विंटल नील हरित शैवाल उत्पादन का लक्ष्य

*772.5 हेक्टेयर में होगा उपयोग, 38.18 मीट्रिक टन तक घटेगी यूरिया की खपत*

*स्वयं के टांकों में नील हरित शैवाल तैयार करेंगे 515 प्रगतिशील किसान, 1030 हेक्टेयर में होगा उपयोग

रायगढ़ @संदेशा 24

प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा देने और खेती में मिट्टी की घटती उर्वरता और लगातार बढ़ती रासायनिक खादों की लागत के बीच इस वर्ष से धान और अन्य फसलों में नील हरित शैवाल खाद का उपयोग करने के लिए राज्य शासन के निर्देश पर जिले में ठोस कार्य योजना बना कर क्रियान्वयन शुरू कर दी गई है। यह खाद किसानों के लिए एक प्रभावी और टिकाऊ विकल्प बनकर उभरेगा। मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला यह जैविक संसाधन खेतों की सेहत सुधारने, फसल की बढ़वार मजबूत करने और खेती की लागत घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यही वजह है कि जिले में आगामी खरीफ सीजन को ध्यान में रखते हुए बड़े स्तर पर नील हरित शैवाल उत्पादन एवं उपयोग की कार्ययोजना तैयार की गई है। धान और अन्य फसलों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने और इस खाद का उपयोग कराने और इसके अनेकों फायदे को किसानों तक पहुंचाने के लिए राज्य शासन के निर्देश पर कलेक्टर द्वारा जिला पंचायत, कृषि, खाद्य, सहकारिता और विपणन और उद्यानिकी विभागों की संयुक्त बैठक लेकर लगातार समीक्षा की जा रही है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की मंशानुरूप तथा संभाग स्तरीय एपीसी बैठक में दिए गए निर्देशों के पालन में कलेक्टर श्री मयंक चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में जिले में हरी खाद एवं जैविक उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने विशेष कार्ययोजना तैयार की गई है। इसके तहत जिले के 95 चिन्हांकित गौठानों के 309 टांकों में नील हरित शैवाल तैयार किया जाएगा। इसके लिए 463.50 किलोग्राम मदर कल्चर का उपयोग किया जाएगा, जिससे लगभग 7725 क्विंटल नील हरित शैवाल उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस जैविक खाद का उपयोग 772.5 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रायोगिक तौर पर किया जाएगा, जिससे अनुमानित 38.18 मीट्रिक टन तक यूरिया की खपत में कमी आने की संभावना है। यह पहल किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती की ओर प्रेरित करेगी।

गौठानों के चयन में रायगढ़ विकासखंड के 17, खरसिया के 5, तमनार के 6, पुसौर के 11, धरमजयगढ़ के 17, घरघोड़ा के 13 तथा लैलूंगा के 26 गौठान शामिल किए गए हैं। प्रशासन द्वारा चरणबद्ध तरीके से मदर कल्चर वितरण की कार्ययोजना भी तैयार की गई है। शासकीय कृषि प्रक्षेत्र बेहरामार, धरमजयगढ़ में लगभग 6 क्विंटल मदर कल्चर 17 मई को प्राप्त होगा। इसका वितरण 18 मई को उप संचालक कृषि कार्यालय रायगढ़ परिसर से रायगढ़, पुसौर, खरसिया एवं तमनार विकासखंडों के प्रथम चरण के चयनित टांकों हेतु किया जाएगा। वहीं धरमजयगढ़, घरघोड़ा एवं लैलूंगा विकासखंड सीधे बेहरामार से कल्चर प्राप्त करेंगे। लैलूंगा विकासखंड को प्रारंभिक रूप से 30 किलोग्राम कल्चर उपलब्ध भी करा दिया गया है। द्वितीय चरण के लिए बीज निगम कृषि प्रक्षेत्र बोईरदादर से 23 मई तक लगभग 8 क्विंटल कल्चर प्राप्त होने की संभावना है। तैयार स्थिति के अनुसार इसका वितरण सीधे बोईरदादर से किया जाएगा।

*515 प्रगतिशील किसान स्वयं तैयार करेंगे नील हरित शैवाल*

जिला प्रशासन किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल कर रहा है। जिले के 515 प्रगतिशील किसानों को स्वयं के टांकों में नील हरित शैवाल उत्पादन हेतु चिन्हांकित किया गया है। इनमें रायगढ़ के 85, खरसिया के 69, तमनार के 40, पुसौर के 70, धरमजयगढ़ के 115, घरघोड़ा के 60 तथा लैलूंगा के 75 किसान शामिल हैं। इन किसानों द्वारा कुल 515 टांकों में उत्पादन किया जाएगा, जिसके लिए 257.50 किलोग्राम मदर कल्चर की आवश्यकता होगी। इससे लगभग 10,300 क्विंटल नील हरित शैवाल उत्पादन संभावित है, जिसका उपयोग 1030 हेक्टेयर क्षेत्र में किया जाएगा। इससे लगभग 50.88 मीट्रिक टन तक यूरिया की खपत में कमी आने का अनुमान है। किसानों को इस अभिनव पहल से जोड़ने के लिए किसान मित्र, कृषि विभाग तथा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के कृषि मित्रों द्वारा लगातार गांव-गांव पहुंचकर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। किसानों को नील हरित शैवाल तैयार करने की विधि, इसके उपयोग तथा इसके लाभों की जानकारी दी जा रही है, ताकि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती की ओर प्रेरित हो सकें।

*मैदानी अमलों को दिया गया विशेष प्रशिक्षण*

नील हरित शैवाल उत्पादन को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए कृषि विभाग रायगढ़ द्वारा कृषि विकास अधिकारियों, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों, ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारियों एवं अन्य मैदानी अमलों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण में नील हरित शैवाल उत्पादन की तकनीक, जैव उर्वरकों के लाभ तथा किसानों को व्यवहारिक रूप से इससे जोड़ने के उपायों की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण का उद्देश्य मैदानी अमलों को तकनीकी रूप से दक्ष बनाकर किसानों को स्वयं उत्पादन के लिए प्रेरित करना है।

*क्या है नील हरित शैवाल ?*

नील हरित शैवाल एक प्राकृतिक सूक्ष्म जीव है जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को सोखकर मिट्टी में स्थिर करता है। धान की फसल के लिए इसे एक प्राकृतिक यूरिया के रूप में जाना जाता है। कृषि विभाग के अनुसार नील हरित शैवाल धान उत्पादन के लिए अत्यंत उपयोगी जैविक खाद है, जिसे किसान अपने खेत के पास ही आसानी से तैयार कर सकते हैं। इसके लिए 2ग्1 मीटर का गड्ढा या टैंक तैयार कर उसमें प्लास्टिक शीट बिछाई जाती है। फिर 10 से 15 किलो खेत की मिट्टी एवं 5 से 10 सेंटीमीटर पानी डालकर मिश्रण तैयार किया जाता है। इसके बाद 200 से 250 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा लगभग 100 ग्राम चूना मिलाया जाता है। फिर 1 से 2 किलो पुराना नील हरित शैवाल कल्चर पूरे टैंक में समान रूप से फैला दिया जाता है। पर्याप्त धूप एवं नियंत्रित जलस्तर बनाए रखने पर 7 से 10 दिनों में पानी की सतह पर हरी-नीली परत बन जाती है, जिसे सुखाकर जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है।
धान के खेत में 10 से 15 किलो प्रति हेक्टेयर उपयोग किया जा सकता है। इसके उपयोग के समय खेत में पानी भरा होना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार नील हरित शैवाल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, फसल वृद्धि में सुधार करने तथा खेती की लागत घटाने में अत्यंत प्रभावी है। यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करता है और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिला प्रशासन की यह पहल किसानों को कम लागत, अधिक उत्पादन और टिकाऊ खेती की दिशा में नई राह दिखा रही है। लगातार बढ़ती रासायनिक खेती की चुनौतियों के बीच नील हरित शैवाल किसानों के लिए एक सरल, सस्ता और पर्यावरण हितैषी विकल्प बनकर उभर रहा है।

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