बालक हलधर के ‘हठ से तपस्वी श्री सत्यनारायण बाबा..जन्मदिवस पर विशेष

बालक हलधर के ‘हठ से तपस्वी सत्यनारायण बाबा
प्रकृति को चुनौती देते तपस्वी सत्यनारायण बाबा के जन्मदिवस पर विशेष
तमनार @ संदेशा 24 दुलेन्द्र पटेल
यूं तो भारत को संतों व महात्माओं का देश माना जाता है और संतों का चमत्कार देखा भी जाता है। ऐसी एक तपस्वी जो छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में है जिन्होंने सालों से अन्न का एक दाना ग्रहण नहीं किया। ऐसे बहुत कम योगी होते हैं जो सभी भौतिक सुख-सुविधाओं को त्याग कर तप में लीन हो जाते हैं। रायगढ़ के इस हठयोगी भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। न सिर्फ ये लोगों के आस्था का केंद्र है बल्कि विज्ञान को भी चुनौती दे रहे हैं।
रायगढ़ शहर से महज 6 किलोमीटर दूर स्थित कोसमनारा गांव छत्तीसगढ़ में नहीं बल्कि पूरे देश में इस हठयोगी की वजह से प्रसिद्ध है। इनकी कठिन तपस्या को देखने दूर-दराज से लोग आते हैं। लोगों का मानना है कि हर मौसम में बाबा सत्यनारायण इसी तरह जप में लीन रहते हैं। लोग बाबा को शिव भक्त मानते हैं.

बाबा को मानने वालों की फेहरिश्त भी काफी लंबी है. बाबाधाम कोसमनारा में बाबा सत्यनारायण का 37वां जन्मोत्सव 12 जुलाई को धूमधाम से मनाया जाएगा। चूंकि कोविड काल चल रहा है इसलिए कोविड नियमों के पालन में भी खासा ध्यान रखा जाएगा। बाबाधाम सेवा समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि चूंकि बाबाधाम में सुबह से ही भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है इसलिए खासा इंतजाम किया गया है।
कैसे बने हलधर से बाबा सत्यनारायण
कोसमनारा से 19 किलोमीटर दूर देवरी, डूमरपाली में एक साधारण किसान दयानिधि साहू एवं हंसमती साहू के परिवार में 12 जुलाई 1984 को हलधर साहू का जन्म हुआ, सत्यनारायण बाबा 16 फरवरी 1998 को आम दिनों की भांति घर से स्कूल जाने के लिए निकले। पर स्कूल ना जाकर अपने ईष्ट देव का नाम जाप करने के लिए पूर्व में ईश्वर द्वारा निर्धारित उचित स्थान की तलाश में चल पड़े। पैतृक ग्राम डुमरपाली से 18 किमी दूर कोसमनारा ग्राम के उजाड़ जगह पर तलाश पूरी हुई और बालक ने इसी स्थल को अपनी तपोस्थली बना लिया।

उसी दिन एक पत्थर को शिवलिंग मानकर अपनी जिव्हा अर्पित कर तपस्या में लीन हो गए। यहीं से उनके बाबा सत्यनारायण बनने की कहानी शुरू हुई। लगभग एक सप्ताह बाद एक सेवक ने शिवलिंग के बगल में बाबा से आज्ञा लेकर अग्नि (धुनि) प्रज्जवलित कर दी, जो आज भी अखण्ड धुनि के रूप में निरंतर प्रज्जवलित है। शुरू में बाबा की तपस्या को आम लोगों के द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा था। बाबा को उनके स्थान से उठाने का प्रयास प्रशासन एवं कई लोगों द्वारा किया गया। बाबा की तपस्या को देखकर जहां परेशान करने वाले बढ़ रहे थे, वहीं श्रद्धालु भक्तों की भी संख्या लगातार बढ़ रही थी। इसी को देखते हुए बाबा की 24 घंटे चौकसी होने लगी। बाबा की तपस्या की ख्याति धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगी।

बाबा को मिली है श्री 108 की उपाधि
यहां के श्रद्धालु बताते हैं कि बाबा की ख्याति सुनकर आसाम कामाख्या से 108 मौनी कलाहारी बाबा (उम्र 108 वर्ष) भी कोसमनारा, रायगढ़ सत्यनारायण बाबा की तपस्या देखने आए। बाबा की तपस्या से प्रभावित होकर दो से आठ अपै्रल 2003 तक 108 सतचण्डी महायज्ञ किया गया एवं बाबा सत्यनारायण को श्री 108 की उपाधि देकर अपने धाम को वापस चले गए। तब से आज तक प्रतिवर्ष उनके अनुयायी यहां कोसमनारा आते है।
धीरे-धीरे संवरता रहा धाम
कोसमनारा स्थित जिस स्थान पर बालक हलधर ने तप प्रारंभ की, उस स्थल पर धीरे-धीरे निर्माण शुरू हुआ, सबसे पहले कुटिया बनी, फिर पानी की व्यवस्था हुई। धीरे-धीरे बाबा जी का धाम अपना स्वरूप लेने लगा। पत्थरों की जगह शिवलिंग की स्थापना हो गई। धुनि की जगह हवन कुण्ड बना दिया गया। बाबा खेत की जमीन पर बैठे थे। भक्तों के अनुरोध पर चबूतरा पर बैठने को राजी हुए। वहीं जगत जननी अष्टभुजी दुर्गा माता मंदिर का निर्माण 2009 में पूर्ण हुआ।
खुले आसमान के नीचे साधना करते हैं बाबा
बाबा 16 फरवरी 1998 से अब तक तीनों मौसम ग्रीष्म, वर्षा एवं ठंड ऋ तु में खुले आसमान के नीचे निरंतर सुबह सात से रात्रि 12:00 बजे तक अपने ईश्वर की साधना में तपस्यारत रहते हैं। बाबा रात्रि 12:30 बजे दो बजे तक आने वाले सभी भक्तों से मुलाकात करते हंै और बाबा अपनी बात भक्तों को ईशारे से समझाते हंै। शनिवार को बाबाजी अपने भक्तों से रात्रि 12:30 से सुबह पांच बजे तक मिलते हैं।



