तमनार में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध डॉ चिन्मय पंड्या जी का भव्य अभिनंदन,गायत्री परिजनों को दिए आशीर्वचन

तमनार में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध डॉ चिन्मय पंड्या जी का भव्य अभिनंदन,गायत्री परिजनों को दिए आशीर्वचन
तमनार @ संदेशा 24 दुलेन्द्र पटेल 21.10.2021 केलो वनांचल आदिवासी बाहुल्य तमनार की गायत्री मंदिर में आगमन पर आरती तिलक रौली के साथ स्वागत पश्चात मां गायत्री की पूजा अर्चना के पश्चात आशीर्वचन दिया गया

गायत्री परिवार तमनार द्वारा उन्हें मंत्र दुपट्टा श्रीफ़ल साल से सम्मानित करते हुए अभिनंदन पत्र भेंट किया गया।

डॉ.चिन्मय पंड्या प्रतिकुलपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय शांतिकुंज हरिद्वार अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध गायत्री परिवार के अग्रदूत आध्यात्म एवं संस्कृति के उन्नायक ओजस्वी युवा प्रवक्ता गुरुदेव- माता जी के सपनों को साकार करने युग निर्माण योजना जैसे उत्तर दायित्व को मुक्त रूप देने करोड़ो गायत्री परिजनों में नूतन उत्साह एवं नवप्राण का संचार करने वाले पंड्या जी को अपने बीच पाकर सैकड़ो गायत्री परिजन गौरवान्वित हुए।

उल्लेखनीय है कि डॉ. चिन्मय पंड्या जी देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं साथ ही राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई नामी सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर नोबेल पुरस्कार के समकक्ष टेम्पलटन पुरस्कार के ज्यूरी के मेंबर हैं। संयुक्त राष्ट्र संगठन द्वारा विश्व शांति के लिए गठित अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक आध्यात्मिक मंच के निदेशक के साथ ही इंडियन काउंसिल आफ कल्चरल परिषद के सदस्य जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं।
उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि आज मनुष्य अहंकार स्वार्थ में परिपूर्ण है व्यक्ति को भगवान भी वरदान देंगे तो भी उसका मनोकामना स्वार्थ पूर्ण नहीं हो पाएगा। देवासुर संग्राम सतयुग में ही नहीं चला बल्कि आज भी चल रहा है जन-जन के हृदय में सत्य और असत्य के रूप में हमेशा युद्ध चल रहा है हमें सत्य को ही स्वीकार करना है साथ ही आज रावण को लंका में ही खोजने की आवश्यकता नहीं है बल्कि अपने अंदर के छुपे दोश दुर्गुणों रूपी रावण को मारने की आवश्यकता है तभी हम एक अच्छा नागरिक बन सकते हैं परम पूज्य गुरुदेव ने इसी संकल्पना के आधार पर गायत्री परिवार का स्थापना किया था ताकि प्रत्येक व्यक्ति में देवत्व का उदय हो और घर परिवार में स्वर्गीक वातावरण बन सके हम मंदिरों में भगवान को ना ढूढे बल्कि दीन दुखियों एवं असहायों के बीच मे मानवता की सेवा करें तभी हम ईश्वर की सच्चे आराधक हो सकते है।इसके लिए गुरुदेव ने गायत्री परिवार के लिए मार्गदर्शन के रूप में सप्तसूत्रीय कार्यक्रम दिया है जिसके माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचकर हम समाज का सेवा कर सकते है।



