माँ मानकेश्वरी मंदिर कर्मागढ़ में शरद पूर्णिमा महोत्सव,आर्केस्टा की रही धूम

माँ मानकेश्वरी मंदिर कर्मागढ़ में शरद पूर्णिमा महोत्सव,आर्केस्टा की रही धूम
तमनार @संदेशा 24 (दुलेन्द्र पटेल) 21.10.2021 केलो बनांचल आदिवासी बाहुल्य तहसील तमनार के पहाड़ो से घिरा ग्राम करमागढ़ में शरद पूर्णिमा पर माँ मानकेश्वरी मंदिर में बलि पूजा होती है फिर बकरे की बलि दी जाती है। लैलूंगा विधायक चक्रधर सिंह सिदार के सौजन्य से रात्रिकालीन आर्केस्टा आयोजन किया गया जिसमे धार्मिक जसगीत व छत्तीसगढी ओड़िया गीतों में दर्शक खूब झूमे।

रियासत कालीन देवी मां मानकेश्वरी देवी के पूजा की परंपरा कर्मागढ़ में अब भी जारी है। यहां राजघराने की कुल देवी मां की पूजा हर वर्ष शरद पूर्णिमा के दिन की जाती है।इस वर्ष भी बुधवार को यहां शरद पूर्णिमा महोत्सव मनाया गया और बल पूजा किया गया। जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच कर माता के चरणो में मत्था टेका और आर्शीवाद लिया। बुधवार की दोपहर तीन बजे से बल पूजा का कार्यक्रम शुरू किया गया। पूजा के बाद बैगा के शरीर भीतर जब माता का प्रभाव हुआ, तो भक्त ने बकरों की बली दिया।इसके बाद बैगा बकरों का रक्तपान करने लगे। इस पूरे पूजा को देखने वाले श्रद्धालुओं के रोम-रोम खड़े हो गए। दोपहर से शुरू हुई पूजा देर शाम तक चली। इसके बाद सभी भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी मां मानकेश्वरी देवी आज भी अपने चैतन्य रूप में विराजित हैं और माता समय-समय पर अपने भक्तों को अपनी शक्ति से अवगत कराती है।रायगढ़ राज परिवार से कुमार देवेंद्र सिंह,उर्वशी देवी सिंह,योगेंद्र प्रताप सिंह,त्रिशिवम सिंह ने विधि विधान के साथ परंपरा अनुसार पूजा अर्चना की गई।

मंगलवार की मध्यरात्रि को बैगा द्वारा गोंडवाना परंपरा के अनुरूप गुप्त रहस्यमय पूजा मंदिर में किया गया। इस दौरान राजघराने के भी सदस्य मौजूद थे। पूजा से पहले गांव में मुनादी कराई गई और किसी को भी घर से बाहर नहीं निकलने दिए जाने की परांपरा है। मान्यता है कि इस दौरान माता को प्रवेश होता है।इस वर्ष भी दर्जनों बकरों की बलि दी गई बलि के पश्चात बकरे का सर जब धड से अलग हो जाता है उसके पश्चात बैगा द्वारा खुन को पिया जाता है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों में जिला वनोपज अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह सिदार ,मानिक पटनायक, मुकुंद मुरारी पटनायक, कैलाश गुप्ता, लालचंद साहू,गुलापी सिदार,विद्यावती, कुंजबिहारी सिदार,संपत्ति यशवंत सिंह राठिया, निषामणी बेहरा,घुराउ सारथी, जितेन्द्र लगड़,शिव चौहान, मनीष ठेठवार,दुखीश्याम मिश्र,जोबरो सरपंच कृष्ण कुमार राठिया अन्य आसपास ग्राम गणमान्य नागरिक हजारो ग्रामीणजन शामिल हुए।
*रियासतकालीन परंपरा महोत्सव*
ग्रामीणों ने बताया कि लगभग 600 वर्ष पूर्व जब एक पराजित राजा जो हिमगिरि (ओडिशा )रियासत का था उसे देश निकाला देकर बेडियो से बांधकर जंगल में छोड़ दिया गया ।राजा जंगल जंगल भटकता और वह कर्मागढ़ में पहुंच गया तब उन्हें देवी ने दर्शन देकर बंधन मुक्त किया इस तरह एक घटना सन 1780 में तब हुई थी जब ईस्ट इंडिया कंपनी अंग्रेज ने एक तरह से कठोर (लगान) कर के लिए रायगढ़ और हिमगिर पर वसूली के लिए आक्रमण कर दिया। तब यह युद्ध कर्मागढ के जंगली मैदान पर हुआ था इसी दौरान जंगल से मधुमक्खियों जंगली कीटों का मंदिर की ओर से अंग्रेज पर हुआ ।इस दौरान अंग्रेज पराजित होकर उन्होंने भविष्य में रायगढ़ स्टेट को स्वतंत्र घोषित कर दिया इस कारण श्रद्धालु यहां दुर दुर से अपनी इच्छा पूर्ति के लिए आते हैं और माता से मनचाहा वरदान अपनी झोली मे आशीर्वाद के रुप में पाकर खुशी खुशी लौट जाते हैं।



