केलो बनांचल आदिवासी बाहुल्य तहसील तमनार के ग्राम सराईटोला में मनाया गया पेसा कानून स्थापना दिवस

केलो बनांचल आदिवासी बाहुल्य तहसील तमनार के ग्राम सराईटोला में मनाया गया पेसा कानून स्थापना

संदेशा @ तमनार # दुलेन्द्र पटेल 24.12.2020
केलो बनांचल आदिवासी बाहुल्य तहसील तमनार के ग्राम पंचायत सराईटोला में पेसा कानून स्थापना दिवस के अवसर पर एक दिवसीय सम्मेलन में एनजीओ व स्थानीय ग्राम सराईटोला, पेलमा,गारे एवं अन्य गांव के ग्रामीणजन शामिल हुए।सम्मेलन में जनचेतना मंच रायगढ़,मेहनतकश मजदूर किसान एकता संगठन गारे,आदिवासी महिला महा पंचायत,कोयला सत्याग्रह तमनार, छत्तीसगढ़ एकता मंच, नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन संगठन के पदाधिकारी व कर्मचारियों ने पेसा कानून अधिकार नियमों पर जानकारी के साथ आगामी ग्राम सभा को मजबूत करने चर्चा परिचर्चा की गई। राज्यसभा लोकसभा सबसे पहले ग्राम सभा हेतु सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आवाज बुलंद किया।

जनचेतना मंच रायगढ़ से राजेश त्रिपाठी सविता रथ राजेश गुप्ता पद्मनाभ प्रधान शिव कुमार पटेल पार्वती भगत भोजमोती राठिया नित्या राठिया आरती राठिया ज्योति सिदार ,शकुंतला चौहान, गणेशवती, हरिहर पटेल,रामेश्वर समरथ,कार्तिक राम पोर्त,सूरज यादव,सुरेन्द्र पटनायक अन्य ग्रामीणजनों की उपस्थिति रही।

पेसा के तहत ग्राम सभा और पंचायतो को प्रशासन और नियंत्रण की शक्ति
संविधान की पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के सम्बन्ध में पेसा कानून में प्रावधान किया गया है. अनुसूचित जनजातियाँ प्राचीन रीति-रिवाजों और प्रथाओं की एक सुव्यवस्थित प्रणाली के माध्यम से अपने प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करते रहे हैं और अपने निवास स्थान में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को संचालित करते रहे हैं। इस अभूतपूर्व सामाजिक परिवर्तन के युग में आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक-आर्थिक परिवेश को छेड़े या नष्ट किए बिना उन्हें विकास के प्रयासों की मुख्य धारा में शामिल करने की अनिवार्य आवश्यकता भारत की संसद द्वारा महसूस की गई और अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून के द्वारा ग्राम सभाओं और पंचायतों को लोगों की परंपराओं और रीति-रिवाजों को सुरक्षित रखने और संरक्षित करने के अधिकार दिए गए। साथ ही उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधन और विवाद समाधान और स्वामित्व के प्रथागत तौर-तरीके, गौण खनिज, लघु वन उपज का स्वामित्व, आदि को भी मान्यता पेसा में दी गयी।
ग्राम सभा सर्वोच्च
पिछले 27 सालों में अभी तक ग्राम/जनपद/जिला पंचायत को ग्रामसभा से बड़ा माना जाता रहा है जबकि ऐसा है नहीं। ग्राम सभा सर्वोपरी है। ग्राम पंचायत सिर्फ उसके द्वारा लिए गए निर्णय का क्रियान्वयन करने वाली कार्यकारी समिति है। लेकिन यह बात ग्रामसभा को ही पता नहीं है। जागरूकता की कमी के चलते ग्राम सभा आज भी उच्च स्तर की पंचायत संस्थाओं के माध्यम से निर्देशित और संचालित होती है जो कानून के विपरीत है।
पेसा से असंगत कोई नया कानून नहीं
पेसा कानून की में स्पष्ट रूप से लिखा है कि राज्य का विधान मंडल ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाएगा जो धारा 4 के (क) से (ण) तक के प्रावधानों से असंगत हो। जब ऐसा है तो विधानसभा में बनने वाले सभी कानून, जो अनुसूचित क्षेत्र में लागू होने वाले होंगे, उन को बनाने के लिए या बनाने से पहले अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाओं से परामर्श करना / सहमति लेना अनिवार्य है। दुःख की बात है की आज तक बने सभी कानून बिना परामर्श/सहमति के सीधे लागू किये जा रहे है जो कि पेसा की अंतरात्मा पर चोट है।
पेसा अनुरूप अन्य कानूनों में बदलाव:-
पेसा कानून की धारा पांच के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में जो प्रवृत विद्यमान कानून थे उन सारे कानूनों को पेसा में दिए गए प्रावधानों के अनुसार संशोधित करना था। जो भी कानून के प्रावधान पेसा से असंगत थे उन्हें भी एक साल के भीतर बदल कर पेसा अनुरूप परिवर्तन व संशोधन के साथ लागू किया जाना चाहिए था। ऐसा संशोधन करते वक़्त वहां के रहने वाले जनजातीय समूहों की परम्परा और व्यवहारों को भी ध्यान में रखना था। छत्तीसगढ़ में हम देखे तो आबकारी अधिनियम, पंचायत राज अधिनियम, भू-राजस्व संहिता, इत्यादि गिने-चुने 5-6 कानूनों में ही संशोधन किए गए। लेकिन अधिकांश में स्थानीय जनजातीय समूहों की परम्परा और व्यवहारों को अनदेखा कर दिया गया।
